सास बहू रिश्ते नाते घर परीवार

सास की चाल: पहले तो अपने पति को भड़काती हैं अब अपना बेटा अपना नही रहा बीवी को ऐसे रखता हैं वैसे रखता हैं, कह-कहके पिताजी से दुर कर लेती हैं ताकि वो इस भ्रम मे रहे कि मा दुखी हैं बेटे के लिये ओर फिर बहू को सताना शुरू करती हैं अब उन्हे कोई रोकने वाला नही होता बहू बैचारी सारा कसुर सास के बुढापे मे निकालती हैं, हा ससुरजी की सेवा करती हैं क्यूकि बहू तो मन मे जानती हैं मेरे ससुरजी को भडकाती थी सास ये दिल के बुरे नही थे!

After sometime: वोही बहू जब सास बनती खुद भूल जाती हैं आपबिति ओर वही राह चलती हैं!

ओर बहू तो बहू होती हैं अपना काम करती हैं “जो करे वो भरे” सोचके! तो क्या मिलता हैं सास को घर मे महाभारत करके क्यू ना हम मिलके रहे ओर घर के लोगो को शांति से खुशी से रहने दे! ये क्यू भूल जाती हैं कि वो किसीका पति बनने से पहले मेरा बेटा था ओर रहेगा तो क्यू उसे अपने पापा अपनी बीवी या खुदसे दूर करू क्या मैं इन सबसे खुश रह पाउंगी क्या घर मे खूशिया रह पायेगी, इन सबपे गहरा विचार करे तो घर धनदौलत, खूशियो से ना भर जाये| जिस घर मे सास बहू की बन जाये वो घर कभी पीछे नही रह सकता, ये संयम ओर समझ का रिश्ता हैं जिद मे आके घर की खुशियाँ अपने ही हाथो से न जाने दे और प्यार से घर का साचरण करे|

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